लेख: बंगाल का भविष्यः धर्म की लहर या प्रगति की राह?

personसंपादकीय टीम
calendar_today16 Feb 2026, 10:48 pm
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ललित गर्ग:-

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी बाकी हो, पर राजनीतिक रणभेरी बज चुकी है। इस बार संकेत साफ हैं-चुनाव विकास बनाम विकास के दावे पर नहीं, बल्कि पहचान, अस्मिता और धर्म की ध्वजा के इर्द-गिर्द घूम सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर राज्य भर में प्रस्तावित हिंदू सम्मेलनों को भारतीय जनता पार्टी एक वैचारिक उत्सव भर नहीं, बल्कि चुनावी अवसर में बदलने की रणनीति पर आगे बढ़ती दिख रही है। दूसरी ओर ममता बनर्जी ने भी यह समझ लिया है कि यदि चुनाव की जमीन धार्मिक विमर्श पर खिसकती है तो उसे खाली नहीं छोड़ा जा सकता। कोलकाता के न्यू टाउन में ‘दुर्गा आंगन’ का शिलान्यास और उसे बंगाली अस्मिता से जोड़ने का प्रयास इसी रणनीतिक सजगता का हिस्सा है।
बंगाल की राजनीति लंबे समय तक वर्ग-संघर्ष, वाम वैचारिकी और सामाजिक न्याय के नारों के इर्द-गिर्द घूमती रही। लगभग तीन दशक तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व में वाम मोर्चा सत्ता में रहा। उससे पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रभुत्व था। किंतु 2011 में सत्ता परिवर्तन के साथ एक नई धुरी बनी-तृणमूल बनाम भाजपा। आज स्थिति यह है कि वाम और कांग्रेस हाशिए पर हैं और मुकाबला दो धू्रवों के बीच सिमट चुका है। यही द्विधू्रवीयता चुनाव को अधिक तीखा और अधिक पहचान-केन्द्रित बना रही है। भाजपा का अभियान चार प्रमुख सूत्रों पर टिका है-बंगाल में हिंदू खतरे में है, बांग्लादेशी घुसपैठ, महिलाओं की असुरक्षा और भ्रष्टाचार। सीमावर्ती जिलों का उदाहरण देकर यह संदेश गढ़ा जा रहा है कि जनसांख्यिकीय संतुलन बदल रहा है। अवैध घुसपैठ का प्रश्न नया नहीं है, पर उसे इस समय राजनीतिक ऊर्जा के साथ जोड़ा जा रहा है। आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की घटना, शिक्षक भर्ती घोटाले, हिन्दुओं पर बढ़ते अत्याचार एवं भ्रष्टाचार जैसे प्रसंगों को शासन की विफलता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। भाजपा का लक्ष्य स्पष्ट है-70 प्रतिशत हिंदू मतदाताओं में एक साझा असुरक्षा-बोध निर्मित करना, हिन्दुओं को जागृत करना और उसे मतदान व्यवहार में रूपांतरित करना। आज बंगाल में विकास की सबसे बड़ी बाधा घुसपैठियों का बढ़ना है। घुसपैठियों पर विराम लगाना चाहिए न कि इस मुद्दे पर राजनीति हो।
ममता बनर्जी की चुनौती दोहरी है। एक ओर उन्हें यह संदेश देना है कि वे अल्पसंख्यकों की संरक्षक हैं, दूसरी ओर हिंदू मतदाताओं को यह विश्वास भी दिलाना है कि उनकी आस्था और अस्मिता सुरक्षित है। 2021 के चुनाव में जब भाजपा ने ‘जय श्रीराम’ के नारे को आक्रामक रूप से उछाला, तब ममता ने ‘जय मां दुर्गा’ और ‘चंडी पाठ’ के माध्यम से एक सांस्कृतिक प्रत्युत्तर दिया था। इस बार वे दुर्गा आंगन जैसे प्रतीकों के जरिए यह संकेत दे रही हैं कि बंगाली हिंदू पहचान भाजपा की बपौती नहीं है। वे धर्म को राष्ट्रवाद की बजाय क्षेत्रीय अस्मिता के साथ जोड़ती हैं-“बंगाल अपनी संस्कृति से हिंदू है, पर उसकी राजनीति बहुलतावादी है”-यह उनका अंतर्निहित संदेश है। इसी बीच मुर्शिदाबाद में पूर्व तृणमूल नेता हुमायूं कबीर द्वारा ‘बाबरी मस्जिद’ के शिलान्यास की पहल ने नई जटिलता जोड़ दी है। इससे मुस्लिम मतदाताओं के भीतर एक अलग धू्रवीकरण की संभावना पैदा हुई है। यदि मुस्लिम वोटों का बंटवारा होता है, तो तृणमूल का गणित प्रभावित हो सकती है। 2021 में उसे लगभग 48 प्रतिशत वोट और 223 सीटें मिली थीं-जिसमें मुस्लिम मतों का एकमुश्त समर्थन निर्णायक था। भाजपा 38 प्रतिशत वोट के साथ 65 सीटें जीतकर मुख्य विपक्ष बनी। ऐसे में यदि मुस्लिम मत 5-10 प्रतिशत भी इधर-उधर खिसकते हैं, तो कई सीटों का परिणाम बदल सकता है और भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ सकती है।

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