लेख: होली आध्यात्मिक चेतना एवं वैज्ञानिक दृष्टि का सांस्कृतिक उत्सव
personसंपादकीय टीम
calendar_today28 Feb 2026, 01:21 pm
location_onUtter Pradesh
Morning City
ललित गर्ग:-
होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन की सजीव अभिव्यक्ति है। यह वह पर्व है जो मनुष्य को उसके भीतर झाँकने का अवसर देता है और याद दिलाता है कि जीवन का वास्तविक सौंदर्य बाहरी आडंबर में नहीं, बल्कि अंतःकरण की निर्मलता में निहित है। समय के प्रवाह में होली के स्वरूप में अनेक परिवर्तन आए हैं। कहीं यह उत्सव उल्लास का माध्यम बना, तो कहीं उच्छृंखलता का पर्याय भी दिखाई देने लगा। छेड़खानी, मादक पदार्थों का सेवन, मारपीट और मर्यादा का उल्लंघन जैसी प्रवृत्तियां इस पावन पर्व की आत्मा के विपरीत हैं। वस्तुतः सही अर्थों में होली का अर्थ शालीनता का अतिक्रमण नहीं, बल्कि आंतरिक विकारों का दहन और संबंधों का पुनर्जीवन है। आवश्यकता इस बात की है कि हम होली के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक आयामों को समझें और समसामयिक संदर्भों में उसे एक नई गरिमा और जीवंतता प्रदान करें।
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होली का मूल प्रेरक प्रसंग प्रह्लाद और होलिका की कथा से जुड़ा है। यह कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि गहन प्रतीकात्मक संदेश है। प्रह्लाद अटूट श्रद्धा और सत्यनिष्ठा के प्रतीक हैं, जबकि होलिका अहंकार और दुराग्रह का प्रतिनिधित्व करती है। होलिका-दहन हमें यह सिखाता है कि अंततः विजय सत्य की होती है और अहंकार की ज्वाला स्वयं को ही भस्म कर देती है। जब हम होलिका की अग्नि प्रज्वलित करते हैं, तो उसका वास्तविक अर्थ बाहरी लकड़ियों को जलाना नहीं, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और अहं को दग्ध करना है। यदि यह आंतरिक शुद्धि नहीं हुई, तो होली केवल एक सामाजिक आयोजन बनकर रह जाएगी। रंगों का आध्यात्मिक अर्थ भी अत्यंत गहरा है। भारतीय संस्कृति में प्रत्येक रंग का अपना भाव है। लाल ऊर्जा और प्रेम का प्रतीक है, पीला ज्ञान और पवित्रता का, हरा जीवन और समृद्धि का, नीला अनंत आकाश और व्यापक चेतना का। जब हम एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, तो मानो यह घोषणा करते हैं कि हम भेदभाव की सीमाएँ मिटाकर एकात्मता का अनुभव करेंगे। रंग हमें सिखाते हैं कि विविधता ही जीवन का सौंदर्य है। अलग-अलग रंग मिलकर ही इंद्रधनुष बनाते हैं; उसी प्रकार विभिन्न समुदायों, विचारों और संस्कृतियों का समन्वय ही समाज को समृद्ध बनाता है। यही होली का सांस्कृतिक संदेश है-विविधता में एकता।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी होली का विशेष महत्व है। यह पर्व फाल्गुन पूर्णिमा को आता है, जब शीत ऋतु का समापन और ग्रीष्म ऋतु का आरंभ होता है। यह संक्रमण काल शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के लिए संवेदनशील समय होता है। परंपरागत रूप से होलिका-दहन की अग्नि के समीप बैठना और उसकी ऊष्मा ग्रहण करना स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी माना गया। प्राचीन काल में टेसू के फूलों, चंदन, हल्दी और प्राकृतिक गुलाल से बने रंगों का प्रयोग किया जाता था, जिनमें औषधीय गुण होते थे। वे त्वचा को लाभ पहुँचाते थे और संक्रमण से भी रक्षा करते थे। आज रासायनिक रंगों के दुष्प्रभावों ने इस परंपरा को चुनौती दी है। अतः आवश्यक है कि हम प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल रंगों की ओर लौटें। विकसित भारत की संकल्पना में स्वच्छता, हरित जीवनशैली और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का जो आग्रह है, वह होली के पारंपरिक स्वरूप से पूर्णतः सामंजस्य रखता है। सांस्कृतिक दृष्टि से होली भारतीय समाज की सामूहिक चेतना का उत्सव है। यह वह अवसर है जब सामाजिक भेदभाव की दीवारें कमजोर पड़ती हैं और अपनत्व का रंग गहरा होता है। गाँवों में फाग-गीतों की गूंज, चौपालों पर हास-परिहास, नगरों में सांस्कृतिक आयोजन-ये सब सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करते हैं। होली का एक स्वरूप वह भी है, जब लोग पुराने मनमुटाव भुलाकर गले मिलते हैं और संबंधों को नया आयाम देते हैं। यह पर्व संवाद और समरसता का सेतु बन सकता है, बशर्ते हम इसकी मूल भावना को समझें।

आज के वैश्वीकरण के युग में नई पीढ़ी आधुनिकता को प्रगति का पर्याय मानती है। आधुनिकता स्वागतयोग्य है, किंतु यदि वह मूल्य-विस्मृति का कारण बन जाए, तो समाज का संतुलन बिगड़ सकता है। “बुरा न मानो होली है” का अर्थ किसी की गरिमा को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि हँसी-खुशी के साथ आत्मीयता बाँटना है। महिलाओं के सम्मान, सार्वजनिक मर्यादा और सामाजिक उत्तरदायित्व का ध्यान रखते हुए होली मनाना ही सच्ची भारतीयता है। यदि उत्सव के नाम पर उच्छृंखलता बढ़े, तो वह हमारे सांस्कृतिक आत्मसम्मान के विपरीत है। नई पीढ़ी को यह समझाना होगा कि आनंद और अनुशासन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सांस्कृतिक आत्मविश्वास की नई यात्रा पर अग्रसर है। “नया भारत” और “विकसित भारत” की परिकल्पना केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण से भी जुड़ी है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय परंपराओं, योग, आयुर्वेद और त्योहारों की बढ़ती प्रतिष्ठा इस परिवर्तन का संकेत है। होली जैसे पर्व विश्वभर में भारतीय संस्कृति की पहचान बन रहे हैं। यदि इन्हें शालीनता, पर्यावरण-संवेदनशीलता और आध्यात्मिक चेतना के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो यह भारत की सॉफ्ट पावर को और सुदृढ़ कर सकते हैं। यह समय है जब हम अपने त्योहारों को केवल मनोरंजन तक सीमित न रखकर उन्हें सांस्कृतिक कूटनीति और सामाजिक जागरण का माध्यम बनाएं।
नई विश्व-व्यवस्था में जहाँ तकनीकी प्रगति के साथ मानसिक तनाव और सामाजिक दूरी भी बढ़ रही है, वहाँ होली जैसे उत्सव मानवीय संबंधों को पुनर्स्थापित करने का अवसर देते हैं। डिजिटल युग में लोग आभासी संवाद में अधिक और प्रत्यक्ष संवाद में कम समय दे रहे हैं। होली हमें प्रत्यक्ष मिलन, स्नेह-स्पर्श और सामूहिक उल्लास की अनुभूति कराती है। यह सामाजिक एकाकीपन को दूर करने का भी माध्यम बन सकती है। यदि हम इस अवसर पर समाज के वंचित वर्गों, वृद्धजनों और जरूरतमंदों के साथ रंग साझा करें, तो यह उत्सव करुणा और सेवा की भावना को भी सशक्त करेगा। आवश्यकता है कि होली को नशामुक्त, पर्यावरण-अनुकूल और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाने का सामूहिक संकल्प लिया जाए। विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और धार्मिक संगठनों के माध्यम से होली के मूल संदेश को प्रचारित किया जा सकता है। फाग-गीत, लोकनृत्य, कवि-सम्मेलन और सामूहिक प्रार्थना जैसे आयोजनों से इस पर्व को नई दिशा दी जा सकती है। जब होली केवल रंगों तक सीमित न रहकर विचारों का उत्सव बनेगी, तभी उसका वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होगा।

निश्चित तौर पर होली हमें यह सिखाती है कि बाहरी रंग क्षणिक हैं, किंतु आंतरिक प्रेम और सद्भाव शाश्वत हैं। यदि हम अपने भीतर के अहंकार को जला दें और हृदय में करुणा का रंग भर दें, तो हर दिन होली बन सकता है। विकसित भारत का स्वप्न तभी साकार होगा जब आर्थिक उन्नति के साथ सांस्कृतिक चेतना भी समानांतर चले। आइए, इस होली पर हम यह संकल्प लें कि मर्यादा का उल्लंघन नहीं, मर्यादा का उत्सव मनाएँगे; विभाजन नहीं, विश्वास का रंग फैलाएँगे; और उच्छृंखलता नहीं, उत्साह और सद्भाव का संदेश देंगे। जब होली का रंग हमारे चरित्र और आचरण में उतर जाएगा, तभी यह पर्व वास्तव में सार्थक और प्रेरणादायी बन सकेगा।
